प्रकृति का शुभांक 750

प्रकृति का शुभांक 750

प्रस्तावना

प्रिय पाठकों, जय सेवा, जय जोहार, जय फड़ापेन, जय गोंडवाना।

इस पुस्तक को प्रकाशित करने का मात्र उद्देश्य है कि गोंडवाना भूभाग के गण्डजीवों का कोया पुनेम (गोंडी धर्म), भाषा, संस्कृति तथा वर्षों पुराना वैभवशाली इतिहास होने के बाद भी आज हमारा समाज पूरे देश में पहचाने जाने में असमर्थ है।

उस वैभवशाली इतिहास एवं प्रकृति दर्शन को पुनः इसके माध्यम से सगा गण्ड जीवों के सामने लाने एवं बचाने का यह एक विनम्र प्रयास है। वर्ष 2015 उत्तर प्रदेश, जिला बलिया, मोड़ सुंदर नगर

कॉलोनी की धरा में सम्माननीय स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवभूषी जी और उनकी धर्म पत्नी तिरूमाय उर्मिला जी अर्थात् दोनों पति पत्नी के अथक प्रयास से गोंडी धर्म (कोयापुनेम) भाषा संस्कृति पर आधारित महासम्मेलन अपने निजी गोंडभवन दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। देश के विभिन्न राज्यों से धर्म प्रेमी, समाज सेवी, बुद्धिजीवियों को आमंत्रित किया गया था। महाराष्ट्र राज्य से अखिल गोंडवाना कोया पुनेम भूमका मांदी संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष परम सम्माननीय दादा रावेन इनवाती जी का आगमन हुआ। उसी कार्यक्रम में मध्यप्रदेश से मुझे भी शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भूमका पोय दादा रावेन इनवाती से मिलने पर उनके मांदी से जुड़कर अर्थात् शामिल होकर समाज हित में कार्य करने की इच्छा हुई।

उत्तरप्रदेश के कार्यक्रमों से वापिस आने पर शुभ नस्का गोंगो पूजा के अवसर पर महाराष्ट्र राज्य के नागपुर-जबलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 7 पर स्थित ग्राम पवनी से लगभग 8 कि.मी. की दूरी में पेंच अभ्यारण्य में स्थित वाघोली ग्राम में शिवकुंड की पावन धरा में अपने साथियों के साथ पहुँचकर अखिल गोंडवाना कोयापुनेम भूमका संघ की दीक्षा परम सम्माननीय दादा रावेन इनवाती जी लेकर मैं आज पूरे मध्यप्रदेश के हर जिलों में पहुँचकर कोयापुनेम भूमका संघ मांदी के माध्यम से कोया पुनेम गोंडी धर्म, भाषा, संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने में प्रयासरत हूँ, ताकि सगा समाज में नयी चेतना, समाज में जागृति पैदा हो। ऐसी सोच को लेकर निःस्वार्थ भाव से काम कर रहा हूँ।

सिंह ताराम जी, सम्माननीय दादा कोमल सिंह मरावी जी के साहित्यों का अध्ययन करने के बाद मेरा ध्यान कोयापुनेम शुभांक (750) अर्थात पर लेखन का कार्य प्रारंभ किया। 25 अक्टूबर 2016 को ग्राम पाटा जिला नरसिंहपुर मध्यप्रदेश की पावन धरा में परम सम्माननीय दादा रावेन इनवाती का आगमन हुआ। 750 पर मेरे लेखन कार्य को पढ़कर दादा जी प्रभावित होकर प्रकृति का शुभांक पुस्तक को छपवाने के लिए सुझाव दिये।

फड़ापेन की असीम कृपा से आज मैं प्रकृति का शुभांक, कोयापुनेम का शुभांक का सार लिखकर एवं गोंडवाना भूमभाग के गण्ड जीवों, सगा जनों तक नयी चेतना, नयी जागृति हो ऐसा मेरा छोटा सा समाज हित प्रयास है।

अतः इस पुस्तिका में शोध परख कर लिखने अर्थात लेखन का कार्य कर रहा हूँ। आशा करता हूँ कि आदि गुरु पहांदीपारी कुपार लिंगों कोयापुनेम की व्यवस्था का सार शुभांक में कहीं न कहीं मुझसे त्रुटि हो सकती है। उस त्रुटि को सुधारने का आशीर्वाद प्रदान करने की महान कृपा करेंगे।



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