कोया पुनेम अर्थात प्रकृति का शुभांक (750) का "दहाई अंक" 5 (पाँच) है।

"कोया पुनेम अर्थात प्रकृति का शुभांक (750) का "दहाई अंक" 5 (पाँच) है।"

"01. भूगोल विद्वानों का मत है कि भूमण्डल में पाँच प्रकृति शक्तियाँ विद्यमान हैं

01.भूगोल विद्वानों का मत है कि भूमण्डल में पाँच प्रकृति शक्तियाँ विद्यमान हैं—

  • पृथ्वी
  • जल
  • अग्नि
  • वायु
  • आकाश

02. गण्ड जीवों का निर्माण अर्थात गण्ड जीवों का जन्म पाँच प्रकृति शक्तियों के मेल से होता है। पृथ्वी में माटी तत्व पाया जाता है, ठीक उसी प्रकार मानव तन में अर्थात मनुष्य का जो शरीर होता है, उस शरीर में पाँच प्रकार की माटी विद्यमान है—

  • शरीर के बाल (भद्र)
  • हाथ-पैर के नाखून
  • चमड़ी
  • मांस
  • हड्डी
03. गोंडवाना भूभाग में गण्ड जीवों का अंतिम संस्कार अर्थात मृतक संस्कार का दर्शन पाँच प्रकार से रहा है। 
  • शरीर माटी – मेंदोलमाटी
  • नरा – सोनमाटी
  • मागर माटी – मड़ईंग माटी
  • मुख माटी – तोड़ी सियाना
  • चोतरा – पेनमाटी पेन भीना
गोंडवाना भूभाग के गण्ड जीवों का दर्शन
माता-पिता की क्रिया प्रक्रिया से माँ के उदर में पिण्ड का निर्माण होता है। उसे मेंदोलमाटी अर्थात शरीर का निर्माण माना गया है। इसके बाद नौ माह दस दिन के बाद जीव का जन्म होता है, तब नरा अर्थात सोन माटी का दस्तूर किया जाता है। घर के जिस भाग में मातृ शक्ति बच्चे को जन्म देती है, वहीं पर धरती में नरा गाड़ा जाता है और सृष्टि क्रिया का दस्तूर किया जाता है।
इसके बाद बेटा या बेटी होने पर विवाह किया जाता है, जिसे मड़ईंग संस्कार भी कहते हैं। तब मागर माटी का दस्तूर किया जाता है। गण्ड जीवों के मर जाने पर तोड़ी सियाना अर्थात मुख तरफ से माटी देने का दस्तूर किया जाता है। अंत में पेन माटी अर्थात चोतरा में अंतिम रूप से उस जीव को मिलाया जाता है और गाड़वा पेन भी कहा जाता है।
सर्वप्रथम प्रकृति में पृथ्वी अर्थात माटी तत्व की जानकारी होती है।

02. जल (पानी) जिस प्रकार मानव तन अर्थात गण्ड जीव में पाँच प्रकार का माटी पाया जाता है, ठीक उसी प्रकार मानव तन अर्थात गण्ड जीव में पाँच प्रकार का पानी पाया जाता है, जैसे—

1. आँखों से जो पानी निकलता है उसे आँसू कहा जाता है। आँख से जो पानी निकलता वह सुख और दुख दोनों स्थिति में निकलता है।
2. अधिक ताप पाकर शरीर से पानी निकलता है उसे पसीना कहते हैं।
3. शरीर के मूत्राशय नली से जो पानी निकलता है उसे पेशाब कहते हैं।
4. नाक से पानी निकलता है उसे सर्दी कहते हैं।
5. मुख से जो पानी निकलता है उसे थूक (लार) कहते हैं।

03. मानव तन अर्थात् गणड जीव में अग्नि (ताप) पाँच प्रकार से विद्यमान है।

1. शरीर अग्नि – पूरा शरीर गरम रहता है।
2. हृदय अग्नि – शरीर को गति प्रदान करती है।
3. चक्षु अग्नि – किसी भी वस्तु, स्थान का दर्शन करने में साथ देती है।
4. पाचन अग्नि – भोजन या कोई अन्य खाद्य वस्तु को पचाने में सहयोग करती है।
5. क्रोधाग्नि – जब कोई गलती किसी साथी, मित्र या परिवार के सदस्यों द्वारा हो जाए या मनपसंद कार्य न हो, तब क्रोधित होना मानव के स्वभाव में निश्चित बनता है, जिसे क्रोधाग्नि कहते हैं।

04. वायु (हवा) मानव तन अर्थात् गणडजीवों में वायु पाँच प्रकार से विद्यमान है—

1. वायु प्राण – प्राण वायु हृदय में पाई जाती है।
2. श्वांस वायु – जो नाक से फेफड़ों के द्वारा अहसास किया जा सकता है।
3. अपान वायु – अपान वायु गुदा में पाई जाती है।
4. नाड़ी वायु – शरीर के समस्त अंगों में नाड़ी के माध्यम से संचालित होती है।
5. पाचन क्रिया वायु – पाचन क्रिया वायु भोजन या कोई भी खाद्य पदार्थ को पचाने में सहयोग करती है।

05. आकाश मनुष्य के शरीर में अर्थात् गणड जीवों में पाँच प्रकार का आकाश पाया जाता है—

  • नजर
  • आवाज
  • अन्तरदृष्टि
  • ध्वनि
  • अनुभव
इस प्रकार से गणड जीवों में पाँच प्रकृति का दर्शन माना गया है, जो सत्य है। मानव तन में अर्थात् शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ भी विद्यमान हैं, जिनके कारण ज्ञान प्राप्त होता है। बिना ज्ञानेन्द्रियों के मानव का विकास नहीं होता।

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ इस प्रकार हैं—
  • आँख – देखना
  • कान – सुनना
  • नाक – सूँघना
  • जीभ – स्वाद
  • त्वचा – छूने, स्पर्श आदि

गणड जीवों में पाँच कर्मेन्द्रियाँ भी विद्यमान हैं—
  • हाथ
  • पैर
  • गुदा
  • पेशाब नली (लिंग)
  • मुख

मानव शरीर अर्थात् गणड जीवों में पाँच अन्तर्दृष्टियाँ भी पाई जाती हैं—
  • अन्तःकरण
  • मन
  • चित्त
  • बुद्धि
  • अहंकार आदि

शरीर के पाँच कोश इस प्रकार हैं—
  • अन्नमय कोश
  • प्राणमय कोश
  • मनोमय कोश
  • विज्ञानमय कोश
  • आनन्दमय कोश 
प्रथम (ऊर्ध्व) – अन्नमय कोश
  • रोम
  • चर्म
  • मांस
  • रक्त
  • अस्थि
पाँच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा पाँच विषय तथा पाँच कर्मेन्द्रियों से क्रिया करना और मन के भीतर अनेक विचार करना, उसको मनोमय कोश कहते हैं।

द्वितीय (रंड) – प्राणमय कोश
  • व्यान
  • समान
  • उदान
  • अपान
  • प्राण
शरीर में जो वायु होती है, उसको व्यान कहते हैं।
नाभि में जो वायु होती है, उसको समान कहते हैं।
कंठ में जो वायु होती है, उसको उदान कहते हैं।
हृदय में जो वायु होती है, उसको प्राण कहते हैं।
गुदा में जो वायु होती है, उसको अपान कहते हैं।

तृतीय (मुँड) – मनोमय कोश
पाँच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा पाँच विषय जानकर पाँच कर्मेन्द्रियों से क्रिया करना और मन के भीतर अनेक विचार करना, उसको मनोमय कोश कहते हैं।
चतुर्थ (तालुंग) – विज्ञानमय कोश
मनोमय रूपी ज्ञान-वृत्ति से विचार करना कि "मैं कौन हूँ, मैं कर्ता हूँ", विज्ञानमय कोश कहलाता है।

अतः: कारण पाँच — मनोमय, उससे ज्ञान, विज्ञानमय, आनन्दमय कोश हैं।
  1. अन्नमय – पृथ्वी
  2. प्राणमय – जल
  3. मनोमय – अग्नि
  4. विज्ञानमय – वायु
  5. आनन्दमय – आकाश

पंचम (सयुगा)
पंच कोश, पंच तत्त्व का आधार ब्रह्म कदाचित सिद्ध होवे तो झूठा जानों, साकार सिद्ध होवे तो शरीर जानों। शरीर रहित पदार्थ मिथ्या पदार्थ प्रसिद्ध है। शरीर में तत्त्व नहीं, प्रकृति है।

मानव तन अर्थात् गण्ड जीवों में जो पाँच प्रकार से प्रकृति विद्यमान है, ठीक उसी प्रकार से प्रकृति के पाँच-पाँच भाग होते हैं।

1. आकाश के पाँच भाग
  1. अन्तःकरण
  2. मन
  3. चित्त
  4. बुद्धि
  5. अहंकार

2. अन्तरिन्द्रिया वायु के पाँच भाग
  1.  व्यान
  2.  समान
  3.  प्राण
  4.  उदान
  5.  अपान
3. अग्नि के पाँच भाग (ज्ञानेन्द्रियाँ)
  1.  आँख
  2.  नाक
  3.  कान
  4. जीभ
  5. त्वचा
4. जल के पाँच भाग (कर्मेन्द्रियाँ)
  1. हाथ
  2. पाँव (पैर)
  3. मुख
  4. लिंग
  5. गुदा
5. पृथ्वी के पाँच भाग (पाँच विषय)
  1. शब्द
  2. स्पर्श
  3. रूप
  4. रस
  5. गंध
प्रमाणित करना है –
1. आकाश का पहला भाग (अन्तःकरण)
व्यान वायु के आधार से कान ज्ञानेन्द्रिय मार्ग शब्द विषय जानकर मुख कर्मेन्द्रिय से बोलता है।
2. आकाश का दूसरा भाग (मन)
समान वायु के आधार से त्वचा इन्द्रिय ज्ञान मार्ग स्पर्श विषय को जानकर हाथ कर्मेन्द्रिय से लेता-देता है।
3. आकाश का तीसरा भाग (चित्त)
उदान वायु के आधार से नेत्र ज्ञानेन्द्रिय रूप विषय जानकर पाँव कर्मेन्द्रिय से चलता है।
4. आकाश का चौथा भाग (बुद्धि)
प्राण वायु के आधार से जिह्वा ज्ञानेन्द्रिय मार्ग रस विषय को जानकर लिंग कर्मेन्द्रिय से बीज एवं मूत्र त्यागता है।
5. आकाश का पाँचवाँ भाग (अहंकार)
अपान वायु के आधार से नासिका ज्ञानेन्द्रिय मार्ग गंध विषय को जानकर गुदा कर्मेन्द्रिय से मल त्यागता है।
शरीर पाँच प्रकार हैं –
  1. स्थूल
  2. सूक्ष्म
  3. कारण
  4. महाकारण
  5. उन्मनी

स्थूल शरीर का पंचमहाभूतात्मक है – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। पाँचों तत्वों के पाँच-पाँच भाग हैं, जिसको प्रकृति कहते हैं।

1. आकाश के पाँच भाग (आकाश प्रकृति)
  1. काम
  2. क्रोध
  3. लोभ
  4. मोह
  5. मद
2. वायु के पाँच भाग (वायु प्रकृति)
  1.  चलना
  2.  दौड़ना
  3.  कूदना
  4.  फैलना
  5. सुकुड़ना

3. अग्नि के पाँच भाग (अग्नि प्रकृति)
  1.  तेज
  2.  क्षुधा
  3.  तृषा
  4.  नींद
  5. आलस

4. जल के पाँच भाग (जल प्रकृति)
  1.  बीज, मूत्र
  2. पसीना
  3.  तृषा
  4. सर्दी
  5. आँसू

5. पृथ्वी के पाँच भाग (पृथ्वी प्रकृति)
  1.  रोम, बाल, भृद (जैसा पुस्तक में मुद्रित है)
  2.  चर्म (चमड़ी)
  3.  मांस
  4. नाखून
  5. अस्थि (हड्डी)

इस प्रकार से स्थूल शरीर की गणना का दर्शन रहा है।

बिल्ली अपने बच्चों को पाँच घर या पाँच जगहों में ले जाकर प्रकृति के नियमों का पालन करती है। ठीक इसी प्रकार गोंडवाना भूभाग के गण्डजीव सगा समाज के लोग अपने रीति-रिवाज परम्परानुसार शादी-विवाह करने का रिवाज है। जब समाज का कोई भी बेटा या बेटी बड़े हो जाते हैं, उनका मंडीगिंग संस्कार किया जाता है। तब मंडप के नीचे बैठने से पहले पाँच घर रघवाई घुमाया जाता है। तब चलकर मंडप के नीचे लड़का-लड़की अर्थात दूल्हा-दुल्हन को बैठाया जाता है। पाँच का दर्शन पंच खण्ड धरती में महत्वपूर्ण माना गया है, जिसे कोई भी समाज चाहे किसी भी धर्म का हो, नकार नहीं सकता।
आदि गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगों जी ने कोया पुनेम के पाँच वंदनीय तत्वों को पाँच खण्ड धरा के गण्ड जीवों को दर्शन कराया, जिसे पारी कुपार लिंगों ने कयुमी लेंगार कहा गया है, जो निम्नानुसार है—
1. सगा
सुर्वेय सगा सेव आन्दुने मावा
सेवा किसो के मंदा कोम

2. गोटुल
सुर्वेय – गोटुल – आन्दुने – मावा
सुर – सर्री ताकी – कोम

3. पेन कड़ा
सुर्वेय – पेन कड़ा आन्दुने मावा
सुर – सर्री – ताकी कोम

4. पुनेम
सुर्वेय – पारंग आन्दुने मावा
पुनेम – सुर – सर्री

5. मुठवा
सुर्वेय मुठवा आन्दुने मावा
मुठवा – सुर – सर्री ताकी कोम
आलोट, आलोट, आलोट

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